बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

रेणुका झील की यादगार यात्रा!

 

एक अनियोजित सफ़र, जो जीवन की अविस्मरणीय स्मृति बन गया

अप्रैल 1995 की बात है। उन दिनों मैं मोहाली में रहता था। अप्रैल का सुहावना मौसम था। पंजाब और हरियाणा के मैदानी इलाकों में गर्मी ने अभी पूरी तरह अपने पाँव नहीं पसारे थे और हिमालय की तलहटी से आने वाली हवाओं में अब भी एक सुखद शीतलता बनी हुई थी।

महीने का दूसरा शनिवार था। शनिवार और रविवार की दो दिन की छुट्टियाँ हँसते-खेलते बीत गई थीं। सोमवार को फिर से कार्यालय की वही परिचित दिनचर्या आरंभ होनी थी। लेकिन नियति ने हमारे लिए कुछ और ही योजना बना रखी थी।

सोमवार की सुबह समाचार मिला कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री मोरारजी देसाई का निधन हो गया है और उनके सम्मान में सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया गया है। अप्रत्याशित रूप से मिली इस अतिरिक्त छुट्टी ने मन में एक नई उमंग जगा दी।

उसी दिन हमारे मित्र सुबोध बंसल अपनी पत्नी के साथ हमारे घर पधारे। बातचीत के दौरान अचानक कहीं घूमने चलने का प्रस्ताव सामने आया। न कोई पूर्व निर्धारित कार्यक्रम, न किसी स्थान का चुनाव और न ही यात्रा की कोई विशेष तैयारी। बस, घूमने की इच्छा जागी और निर्णय हो गया कि आज कहीं निकलते हैं।

उन दिनों हमारे पास बजाज के स्कूटर हुआ करते थे। आज की तरह न मोबाइल फ़ोन थे, न गूगल मैप्स, न ऑनलाइन होटल बुकिंग की सुविधा और न ही हर समय जेब में पर्याप्त नकदी रखने की आदत। जेब में मुश्किल से सौ-दो सौ रुपये रहे होंगे। लेकिन युवावस्था का उत्साह और मित्रों का साथ हो तो भला इन छोटी-मोटी बातों की चिंता किसे होती है!

स्कूटर निकाले गए और हम चारों अपनी छोटी-सी टोली बनाकर निकल पड़े एक ऐसी यात्रा पर, जिसका गंतव्य स्वयं हमें भी नहीं मालूम था।

मंज़िल का पता नहीं, सफ़र का आनंद था

चंडीगढ़ और उसके आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य के मामले में अत्यंत समृद्ध है। शहर से किसी भी दिशा में निकल जाइए, थोड़ी ही दूर पर प्रकृति अपने अलग-अलग रूपों में आपका स्वागत करती दिखाई देती है। कहीं शिवालिक की पहाड़ियाँ, कहीं हरियाली से ढकी घाटियाँ, कहीं घुमावदार सड़कें तो कहीं दूर तक फैले जंगल।

हमारा प्रारंभिक विचार केवल दो-तीन घंटे घूमकर वापस मोहाली लौट आने का था। लेकिन कभी-कभी सफ़र का अपना मन होता है और वह यात्रियों की बनाई योजनाओं की परवाह नहीं करता।

हमारे बजाज स्कूटर चंडीगढ़ से आगे बढ़े। पंचकूला पीछे छूट गया। रास्ते के दृश्य इतने मनोहारी थे कि लौटने का विचार बार-बार टलता गया। थोड़ा और आगे चलते हैं, यह सोचते हुए हम काला आम्ब तक पहुँच गए।

अब नाहन की ओर जाने का रास्ता सामने था। किसी ने प्रस्ताव रखा कि क्यों न नाहन तक चला जाए! भला आपत्ति किसे हो सकती थी? स्कूटरों का रुख नाहन की ओर मुड़ गया।

शिवालिक की पहाड़ियों के बीच बसा नाहन हिमाचल प्रदेश का एक सुंदर और ऐतिहासिक नगर है। वहाँ पहुँचने पर अचानक मुझे रेणुका झील का स्मरण हो आया। कभी किसी पत्रिका या पुस्तक में इस झील के विषय में पढ़ा था। उसके सौंदर्य और प्राकृतिक परिवेश का वर्णन स्मृति में कहीं सुरक्षित था।

हमने स्थानीय लोगों से रेणुका झील का रास्ता पूछा। पता चला कि नाहन से आगे पहाड़ियों के बीच स्थित यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।

अब तक हमारी छोटी-सी तफरीह एक लंबी यात्रा का रूप ले चुकी थी। लेकिन उत्साह ऐसा था कि दूरी और समय का कोई हिसाब ही नहीं रहा।

निर्णय हुआ कि जब यहाँ तक आ ही गए हैं तो रेणुका झील भी देख ली जाए।

और हमारे स्कूटर एक बार फिर आगे बढ़ चले।

घने जंगलों के बीच रोमांच और भय

नाहन से रेणुका की ओर जाने वाला रास्ता उन दिनों आज की अपेक्षा कहीं अधिक संकरा और दुर्गम हुआ करता था। पहाड़ी सड़कें, तीखे मोड़, कहीं चढ़ाई तो कहीं ढलान और दोनों ओर घने जंगल।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, आबादी कम होती जा रही थी और प्रकृति का साम्राज्य विस्तृत होता जा रहा था। सड़क पर वाहनों की आवाजाही भी बहुत कम थी। दूर-दूर तक न कोई दुकान दिखाई देती थी, न ढाबा और न ही कोई बस्ती।

स्कूटरों के इंजनों की आवाज़ उस शांत वातावरण में कुछ अधिक ही सुनाई देती थी। कभी किसी पेड़ की डाल हवा से हिलती, कभी जंगल के भीतर से किसी पक्षी की आवाज़ आती और कभी किसी मोड़ के बाद सामने अचानक एक नई घाटी खुल जाती।

प्रकृति की सुंदरता जितनी आकर्षक थी, रास्ते का एकांत उतना ही रहस्यमय।

रास्ते में एक स्थान पर हमें एक बुजुर्ग व्यक्ति दिखाई दिए, जो सड़क की मरम्मत से संबंधित कोई काम कर रहे थे। हमने स्कूटर रोककर उनसे बातचीत शुरू की।

बातों-बातों में उनसे पूछा कि रेणुका झील पर रात में ठहरने की कोई व्यवस्था है या नहीं।

उन्होंने बताया कि वहाँ पर्यटन विभाग का एक ही होटल है और उसका किराया काफ़ी अधिक है। हमारी सीमित आर्थिक तैयारी को देखते हुए यह सूचना कुछ निराशाजनक थी।

लेकिन उन बुजुर्गवार ने तुरंत एक उपयोगी सुझाव दिया।

उन्होंने कहा कि झील के आसपास साधु-संतों के कई आश्रम हैं। यदि वहाँ किसी महंत से निवेदन किया जाए तो संभव है कि रात बिताने के लिए स्थान मिल जाए।

उनकी बात सुनकर कुछ राहत मिली। हमने उनका धन्यवाद किया और उस सुझाव को गाँठ बाँधकर आगे बढ़ चले।

अब सूर्य धीरे-धीरे पश्चिम की ओर झुकने लगा था। पहाड़ों में शाम मैदानों की अपेक्षा कुछ जल्दी उतर आती है। घने वृक्षों की छाया से सड़क पर अँधेरा और भी गहरा प्रतीत होने लगा।

कुछ स्थानों पर जंगली जानवरों से सावधान रहने की चेतावनी देने वाले साइनबोर्ड लगे थे। इन जंगलों में तेंदुओं के निकलने की बात भी सुनने को मिलती थी।

ऐसे बोर्ड देखकर रोमांच की जगह धीरे-धीरे आशंका ने लेनी शुरू कर दी।

चारों ओर निर्जन जंगल, ढलती शाम, पहाड़ों का अनजान रास्ता और परिवहन के नाम पर हमारे दो बजाज स्कूटर!

मन में तरह-तरह के विचार उठने लगे। कहीं रास्ते में स्कूटर खराब हो गया तो? यदि अँधेरा होने से पहले मंज़िल तक नहीं पहुँचे तो? और यदि सचमुच किसी जंगली जानवर से सामना हो गया तो?

अब तक जिस साहस के सहारे हम बिना सोचे-समझे चले आ रहे थे, वह भी कुछ कमज़ोर पड़ने लगा था।

लेकिन लौटना भी कोई आसान विकल्प नहीं था। नाहन काफ़ी पीछे छूट चुका था और रेणुका झील अब अधिक दूर नहीं होनी चाहिए थी।

हमने साहस जुटाया और आगे बढ़ते रहे।

पहली झलक और सारी थकान ग़ायब

कुछ और दूरी तय करने के बाद अचानक आसपास की पहाड़ियों का स्वरूप बदलने लगा। घाटी खुलने लगी और पेड़ों के बीच से दूर तक फैली हरियाली दिखाई देने लगी।

यह रेणुका घाटी थी।

प्रकृति जैसे धीरे-धीरे अपने सबसे सुंदर दृश्य का पर्दा उठा रही थी।

और फिर एक मोड़ पार करने के बाद जब हम रेणुका झील के समीप पहुँचे तो सामने का दृश्य देखकर हमारी सारी थकान मानो पल भर में ग़ायब हो गई।

चारों ओर पहाड़ियों और घने वृक्षों से घिरी एक विशाल, शांत और अत्यंत सुंदर झील हमारे सामने थी।

झील का स्वच्छ जल आसपास की हरियाली और आकाश की छाया को अपने भीतर समेटे हुए था। पानी की सतह पर हल्की-हल्की लहरें उठ रही थीं। वातावरण में अद्भुत शांति थी, जिसे शब्दों में बाँध पाना कठिन है।

इतनी लंबी और अनिश्चित यात्रा के बाद अचानक ऐसा मनोरम दृश्य सामने आ जाए तो मन की प्रसन्नता स्वाभाविक ही है।

हम स्कूटर खड़े करके झील के किनारे पहुँचे।

झील के निर्मल पानी में बड़ी-बड़ी मछलियाँ तैर रही थीं। उन्हें इतने निकट से देखना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था। कुछ मछलियाँ तो इतनी विशाल थीं कि विश्वास ही नहीं होता था कि इस शांत झील में इतने बड़े आकार की मछलियाँ भी रहती होंगी।

एक और बात ने हमारा ध्यान आकर्षित किया। कुछ मछलियों की नाक में सोने की नथ पहनाई गई थी!

हमारे लिए यह दृश्य बिल्कुल अनोखा था। पता चला कि स्थानीय धार्मिक आस्था के कारण झील की मछलियों को विशेष सम्मान दिया जाता है। उन्हें पकड़ना प्रतिबंधित था। श्रद्धालु उन्हें भोजन डालते थे और कुछ लोग श्रद्धावश मछलियों को नथ भी पहनाते थे।

रेणुका झील केवल प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र नहीं, बल्कि आस्था का भी एक महत्वपूर्ण स्थल है। लोकमान्यता के अनुसार इसका संबंध भगवान परशुराम की माता रेणुका से है। इसी कारण यहाँ की झील और आसपास का क्षेत्र धार्मिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है।

प्रकृति और आस्था का यह अनूठा संगम मन को बहुत भाया।

एक अनजान आश्रम में यादगार रात

झील के सौंदर्य का आनंद लेते-लेते हमें याद आया कि अब रात बिताने की व्यवस्था भी करनी है।

दिन ढल चुका था। हमारे पास न कोई होटल आरक्षित था, न रात में वापस लौटना संभव था। पर्यटन विभाग के होटल का किराया हमारी जेब के अनुकूल नहीं था।

ऐसे में रास्ते में मिले बुजुर्ग का सुझाव याद आया।

हमने आसपास के आश्रमों के विषय में जानकारी प्राप्त की और एक आश्रम में पहुँचकर महंत जी से मिलने का निवेदन किया।

महंत जी के सामने अपनी परिस्थिति रखी। बताया कि हम मोहाली से घूमने निकले थे और बिना किसी पूर्व योजना के यहाँ तक चले आए हैं। अब रात हो गई है और हमें केवल रात बिताने के लिए एक सुरक्षित स्थान चाहिए।

महंत जी ने हमारी बात सुनी और सहर्ष ठहरने की अनुमति दे दी।

हमारी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा।

हमें एक साधारण-सा कमरा दिया गया, जिसमें फ़र्श पर गद्दे बिछे हुए थे। न कोई आलीशान बिस्तर, न आधुनिक सुविधाएँ और न ही किसी होटल जैसी व्यवस्था। लेकिन उस समय हमारे लिए वही कमरा किसी पाँच सितारा होटल से कम नहीं था।

दिन भर के सफ़र के बाद सिर छिपाने की जगह मिल जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

कुछ समय बाद आश्रम में संध्या भजन का कार्यक्रम आरंभ हुआ। हमें भी उसमें सम्मिलित होना पड़ा। भजन-कीर्तन के पश्चात भोजन की व्यवस्था थी।

दिन भर स्कूटर चलाने और घूमने के कारण भूख भी खूब लगी थी। आश्रम का सादा भोजन उस समय अत्यंत स्वादिष्ट लगा।

यह भी एक अनूठा अनुभव था। सुबह घर से निकलते समय किसने सोचा था कि रात किसी अनजान पहाड़ी आश्रम में गुज़रेगी, जहाँ भोजन से पहले भजन गाना होगा!

उस रात हमें एहसास हुआ कि यात्रा का वास्तविक आनंद केवल सुंदर स्थानों तक पहुँचने में नहीं, बल्कि रास्ते में मिलने वाले अनपेक्षित अनुभवों में भी छिपा होता है।

एक बिल्कुल अपरिचित स्थान पर, अपरिचित लोगों के बीच, बिना किसी औपचारिक परिचय और बिना किसी स्वार्थ के मिला यह आतिथ्य आज भी स्मृतियों में सुरक्षित है।

सुबह पाँच बजे की चाय और बेसन के सेव

अगली सुबह लगभग पाँच बजे आश्रम के महंत जी के शिष्यों ने हमें जगा दिया।

पहाड़ी सुबह की अपनी ही विशेषता होती है। हवा में हल्की ठंडक, चारों ओर शांति और प्रकृति के जागने का अहसास।

हमें सुबह-सुबह चाय के साथ बेसन के सेव परोसे गए।

उस समय यह थोड़ा अनोखा अवश्य लगा, लेकिन रात के विश्राम के बाद गर्म चाय और सेव का आनंद ही कुछ और था। आज भी उस यात्रा की चर्चा होती है तो सुबह पाँच बजे मिली चाय और बेसन के सेव की याद अनायास आ जाती है।

आश्रम में नाश्ते की भी व्यवस्था की गई।

महंत जी और उनके शिष्यों की आत्मीयता ने हमें बहुत प्रभावित किया। हम उनके लिए बिल्कुल अनजान यात्री थे, फिर भी उन्होंने जिस सहजता और उदारता से हमारा स्वागत किया, वह हमारी यात्रा की सबसे मूल्यवान स्मृतियों में से एक बन गया।

आज जब यात्राओं की योजना बनाते समय होटल की रेटिंग, सुविधाएँ, ऑनलाइन समीक्षाएँ और अग्रिम भुगतान जैसी दर्जनों बातों पर विचार करना पड़ता है, तब उस छोटे-से आश्रम का निःस्वार्थ आतिथ्य और भी अधिक विशेष प्रतीत होता है।

झील की परिक्रमा और वन्यजीवन का रोमांच

नाश्ते के बाद हमने रेणुका क्षेत्र को और अच्छी तरह देखने का निश्चय किया।

झील के चारों ओर फैली प्राकृतिक सुंदरता मन को मोह लेने वाली थी। हरे-भरे वृक्षों के बीच से झलकता झील का पानी, पहाड़ियों की शांत पृष्ठभूमि और वातावरण का एकांत — सब कुछ अत्यंत आकर्षक था।

हमने वहाँ की लायन सफ़ारी का भी आनंद लिया। वन्यजीवन के इतने निकट होने का अनुभव हमारे लिए विशेष रोमांचकारी था।

उस समय रेणुका क्षेत्र में वन्यजीवों को देखने की व्यवस्था पर्यटकों के आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। जंगलों के बीच वन्यजीवों की उपस्थिति इस स्थान के प्राकृतिक महत्व को और बढ़ा देती थी।

झील के आसपास घूमते हुए हम कभी रुककर तस्वीरें लेने योग्य दृश्यों को निहारते, कभी पानी में तैरती मछलियों को देखते और कभी दूर की पहाड़ियों में खो जाते।

वहाँ जल से विद्युत उत्पादन से संबंधित एक परियोजना देखने का अवसर भी मिला। मेरे लिए यह केवल पर्यटन नहीं, बल्कि तकनीकी दृष्टि से भी रुचिकर अनुभव था। पहाड़ी क्षेत्रों में जल की ऊर्जा का उपयोग किस प्रकार बिजली उत्पादन के लिए किया जा सकता है, इसे प्रत्यक्ष देखना अपने आप में ज्ञानवर्धक था।

समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला।

लेकिन हर सुंदर यात्रा की तरह इस यात्रा का भी एक व्यावहारिक पक्ष था। हमें उसी दिन मोहाली वापस पहुँचना था और अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी था।

दोपहर होते-होते हमने वापसी का निर्णय लिया।

नाहन के राजमहल की झलक

रेणुका झील और आश्रम की मधुर स्मृतियों को मन में सँजोकर हम फिर अपने स्कूटरों पर सवार हुए और नाहन की ओर चल पड़े।

अब वही रास्ता, जो पिछले दिन ढलती शाम में रहस्यमय और भयावह लग रहा था, दिन के उजाले में अत्यंत सुंदर प्रतीत हो रहा था।

यह भी यात्रा का एक विचित्र अनुभव है। स्थान वही रहता है, सड़क वही रहती है और जंगल भी वही, लेकिन समय और मनःस्थिति बदलते ही उसका स्वरूप बिल्कुल अलग दिखाई देने लगता है।

नाहन पहुँचकर हमने दोपहर का भोजन किया।

इस ऐतिहासिक नगर में सिरमौर रियासत के राजा का महल देखने का अवसर भी मिला। पहाड़ी रियासतों की स्थापत्य परंपरा और राजसी अतीत की झलक देखना अपने आप में रोचक अनुभव था।

कल तक जो नगर हमारे लिए मात्र रास्ते का एक पड़ाव था, आज वह यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था।

भोजन और थोड़े विश्राम के बाद हमने मोहाली की वापसी का रास्ता पकड़ लिया।

स्कूटरों पर लौटते हुए मन में दिन भर के दृश्य बार-बार उभरते रहे — घने जंगल, सुनसान पहाड़ी रास्ते, झील में तैरती विशाल मछलियाँ, आश्रम के महंत जी, भजन के बाद मिला भोजन और सुबह-सुबह चाय के साथ परोसे गए बेसन के सेव।

इनमें से प्रत्येक अनुभव किसी सुंदर माला के मोती की तरह हमारी स्मृतियों में पिरोया जा चुका था।

कुछ यात्राएँ कभी पुरानी नहीं होतीं

आज उस यात्रा को तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है।

इस बीच जीवन में बहुत कुछ बदल गया। यात्राओं के साधन बदल गए, सड़कें बेहतर हो गईं, संचार और आवास की सुविधाएँ कई गुना बढ़ गईं। अब कहीं जाने से पहले मोबाइल पर रास्ता देख लेना, होटल बुक कर लेना और वहाँ के आकर्षणों की जानकारी प्राप्त कर लेना कितना सहज हो गया है।

लेकिन कभी-कभी सोचता हूँ कि सुविधाओं की इस प्रचुरता के बीच क्या हमने यात्रा के उस सहज रोमांच को कुछ खो नहीं दिया है?

उस दिन न हमारे पास कोई यात्रा कार्यक्रम था, न पर्याप्त धन, न मंज़िल का स्पष्ट अनुमान और न ही रात के ठहरने की कोई व्यवस्था।

था तो केवल मित्रों का साथ, युवावस्था का उत्साह, दो भरोसेमंद बजाज स्कूटर और अनजान रास्तों पर आगे बढ़ते जाने की इच्छा।

और इन्हीं साधारण साधनों ने हमें जीवन की एक असाधारण स्मृति दे दी।

यदि उस सोमवार की अतिरिक्त छुट्टी न मिली होती, यदि सुबोध बंसल सपत्नीक घर न आए होते, यदि पंचकूला के बाद हमने लौटने के बजाय काला आम्ब की राह न पकड़ी होती, या नाहन पहुँचकर रेणुका झील का विचार मन में न आया होता, तो शायद यह सुंदर अनुभव कभी हमारे जीवन का हिस्सा ही नहीं बनता।

उस यात्रा ने एक छोटी-सी सीख भी दी थी — कभी-कभी जीवन की सबसे सुंदर मंज़िलें वे होती हैं, जिनके लिए हम घर से निकलते समय कोई योजना ही नहीं बनाते।

रेणुका झील की वह यात्रा हमारे लिए केवल एक पर्यटन स्थल का भ्रमण नहीं थी। वह मित्रता, साहस, प्रकृति, मानवीय सद्भाव और अनायास मिले आनंद का अद्भुत संगम थी।

आज भी जब उस यात्रा का स्मरण करता हूँ तो आँखों के सामने वही शांत झील, हरी-भरी पहाड़ियाँ और जंगलों के बीच बलखाती संकरी सड़कें उभर आती हैं।

और मन में एक ही विचार आता है —

कुछ यात्राएँ हम करते हैं, और कुछ यात्राएँ जीवन भर हमारे साथ चलती रहती हैं। रेणुका झील की वह यात्रा ऐसी ही एक अविस्मरणीय यात्रा थी।

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रेणुका झील की यादगार यात्रा!

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